अँधेरी कुएँ की कहानियाँ – रहस्यमयी कहानी

मालपुर गाँव से एक शांत सा राक्षस था। दिन में यह गाँव थोड़ा सामान्य लगता था, रात में राक्षस ही रहस्यमय हो जाता था। गाँव के किनारे एक बहुत पुराना कुआँ था, जिसे लोग “अंधा कुआँ” कहते थे। उस गांव के बारे में एक ही बात प्रसिद्ध थी—
रात के समय वहाँ से आवाज़ें आती थीं।
कोई मान्यता थी कि यहाँ आत्मा निवास करती है,
कोई कहा था कि वह कुँ शापित है,
और कुछ लोग बस इतना ही बोले थे—
“उसके पास मत जाना, बाकी पछताओगे।”
डर की शुरुआत
रवि, जो शहर से पूरी पढ़ाई करके कुछ समय के लिए अपने गांव लौटा था, इन बातों पर विश्वास नहीं था। उसे लगता है कि यह केवल लोगों के मन में होता है।
एक शाम उसने अपनी दादी से पूछा,
“दादी, ये अँधेरे कुँए की कहानियों की कहानी क्या है?”
दादी ने धीरे-धीरे से मंगल जपते हुए कहा,
“बेटा, कुछ रहस्य ऐसे होते हैं जिनमें शामिल है ठीक नहीं।”
लेकिन रवि का मन नहीं माना. उसे पता था कि सच क्या है।
प्रथम ध्वनि
उस रात लगभग साढ़े बारह बजे, जब पूरा गाँव सो चुका था, रवि कोच लेकर अँधेरे कुएँ की ओर निकल गया। हवा का झोंका था और चारों ओर का सादा पासरा हुआ था।
जैसे ही वह कुएँ के पास पहुँचा, उसे लगा जैसे किसी ने बेवकूफ़ आवाज़ में उसका नाम पुकारा।
“रवि…”
उसका दिल तेज़ से देखने लगा।
उसने चारों ओर देखा—कोई नहीं था।
फिर कुएँ के अंदर से आवाज़ आई,
“हम… यहाँ हैं…”
रवि डर गया, लेकिन भागा नहीं। उसने डाकुओं के अंदर के खंभे, मगर के नीचे केवल अंधेरा था।
पुराना रहस्य
अगले दिन रवि गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति ठाकुर जी के पास आये।
उसने सारी बात बता दी।
ठाकुर जी की तबीयत गंभीर हो गई।
उन्होंने कहा,
“सालों पहले इस कुएँ के पास एक छोटा सा आश्रम था। वहाँ कुछ लोग रहते थे, जो समाज से अलग थे। एक रात अचानक आग लग गई। उनमें से कुछ लोग ज़िंदा नहीं बच पाए।”
“लेकिन आवाज़ें?” रवि ने पूछा।
“लोग कहते हैं, उनकी अधूरी बातें आज भी इस कुँए में गूंजती हैं।”
सच की तलाश
रवि को अब डर से ज्यादा जिज्ञासा थी। उन्होंने कहा कि वह इस रहस्य को पूरी तरह से समझेंगे।
उसने अपने दोस्त मोहन के साथ मिलकर जो गांव का ही था और काफी विचार किया था।
दोनों रात में फिर कुएँ के पास पहुँचे।
इस बार आवाज़ें और साफ़ जगहें।
“सुनो हमें…”
“सच बाहर लाओ…”
मोहन घबरा गया।
“रवि, ये ठीक नहीं लग रहा है। चलो वापस चल रहे हैं।”
लेकिन तभी कुएँ के पास ज़मीन का एक हिस्सा धँस गया। दोनो लॉट-गिरते बचे।
उसी स्थान पर उन्हें एक पत्थर का तारा दिखा, जो मिट्टी में दबा हुआ था।
सच हुआ सच
अगले दिन गाँव वालों की मदद से स्मारक हटा दिया गया। नीचे एक परिदृश्य, जो प्राचीन आश्रम के अवशेष तक बताया गया था।
वहाँ पुराने काग़ज़, डायरी और कुछ रिकॉर्ड मिले।
डायरी में लिखा था-
“हमारी आवाज़ दबा दी गई। हमें ग़लत समझा गया। हम दोषी नहीं थे।”
असल में वे लोग कोई अपराधी नहीं थे। उन्हें गलत तरीके से गांव में अलग कर दिया गया था। आग एक दुर्घटना थी, लेकिन किसी ने सच जानने की कोशिश नहीं की।
आवाज़ों का अर्थ
रवि को समझ आ गया कि डरने के लिए बात नहीं, बल्कि सच बताने की बात है।
जब यह बात गांव में फोटो में हुई तो लोगों की सोच लग गई। अँधेरा कुँआ अब डर की जगह नहीं, बल्कि एक स्मृति बन गया है।
गॉनवासियों ने वहां एक छोटा स्मारक स्मारक रखा।
उसके बाद से उस कुएँ से कभी कोई आवाज़ नहीं आई।
अंत
रवि शहर लौट आया, लेकिन उसके मन में एक बात हमेशा रही-
कुछ नज़ारे दिखाने नहीं आतें,
वे केवल सुने जाने की उम्मीद करते हैं।
कहानी के पात्र और उनकी भूमिका (तालिका)
| पात्र का नाम | भूमिका/कार्य |
|---|---|
| रवि | मुख्य पात्र, रहस्य की खोज करता है |
| दादी | अनुभव और लोककथाओं का प्रतीक |
| ठाकुर जी | गाँव के बुज़ुर्ग, अतीत की जानकारी देने वाले |
| मोहन | रवि का दोस्त, व्यावहारिक सोच का प्रतिनिधि |
| आश्रम के लोग | अतीत का दबा हुआ सच और आवाज़ों का कारण |
| गाँव वाले | डर और अफ़गानों का प्रतीक |