आख़िरी लिफ़्ट का रहस्य

शहर के बीचों-बीच सूर्यकांत टॉवर का नाम वह इमारत जिसके बाहर से बिल्कुल आम थी। काँच की किश्तियाँ, चौबीस मंजिलें, निचली टूटी सड़क और भीतर हर समय आते-जाते लोग। लेकिन इस इमारत की एक चीज ऐसी थी, जिसके बारे में लोग धीरे-धीरे फुसफुसा कर लगे थे—
सबसे आखिरी लिफ्ट।
यह लिफ्ट दिन में तो चलती थी, लेकिन रात के ठीक 11:45 के बाद अगर इसमें कोई शामिल नहीं हुआ, तो फिर वह व्यक्तिगत रूप से कभी दिखाई नहीं दिया।
शुरुआत में लोग इसे अफ़वाह मानते रहे। बड़े शहरों में ऐसी बातें आम होती हैं। लेकिन जब तीन लोग एक के बाद एक ही लिफ्ट से गायब हो गए, तो डर सच में वार्ड में लगा।
रहस्यमयी शुरुआत
अनिरुद्ध वर्मा, एक युवा पत्रकार, को रहस्यों में हमेशा डूबी रही थी। जब उन्हें सनकैंट टॉवर की आखिरी लिफ्ट के बारे में पता चला, तो उन्होंने इसे केवल नाम से हटाने से इनकार कर दिया।
उन्होंने अभिलेखों, पुराने पुरालेखों को पढ़ा और पाया कि पिछले पांच दशकों में कुल सात लोग अविश्वसनीय रूप से लापता थे। सभी का आखिरी रिकॉर्ड—
रात 11:45 के बाद लिफ़्ट का इस्तेमाल किया गया।
अनिरुद्ध को लगा, “इत्तेफ़ाक़ हो सकता है, लेकिन सात बार?”
इमारत के लोग
अनिरुद्ध ने बिल्डिंग में रह रहे लोगों से बात शुरू की।
सबसे पहले मिला रघु काका, चौकीदार। पतले बाल, थके हुए बाल और हमेशा काला चेहरा।
“बेटा, उस लिफ़्ट में मत जाना,” रघु काका ने काँपती आवाज़ में कहा,
- “वो लिफ्ट नहीं है…वो दरवाज़ा है।”
- “किसका दरवाज़ा?” अनिरुद्ध ने पूछा।
- “जो नीचे नहीं जाते,” इतने ही स्केलेर रघु काका चुप हो गए।
लिफ्ट संख्या 13
बिल्डिंग में कुल चार लिफ्ट थी। लेकिन आख़िरी लिफ़्ट को लोग लिफ़्ट नंबर 13 कहते थे, जबकि आधिकारिक तौर पर ऐसा कोई नंबर नहीं था।
यह लिफ्ट बाकी लिफ्टों से थोड़ी अलग थी—
इसका शीशा धुँधला था
अंदर बिज़नेस सी ठंड रहती थी
और बटन पर कोई मंज़िल नंबर नहीं लिखा था
बस एक ही बटन—
नीचे की ओर तीर
पुराना
अनिरुद्ध को आखिरकार पुराने जमाने की इमारत की एक रिपोर्ट मिली।
10 साल पहले इसी जगह पर हुआ था भयानक हादसा। निर्माण के समय लिफ्ट का केबल टूट गया था। लिफ्ट सीधे बेसमेंट से भी नीचे जा गिरी थी।
उस हादसे में पांच मजदूरों की मौत हो गई थी।
रिपोर्ट में आखिरी लाइन थी-
“लिफ़्ट को बंद कर दिया गया है।”
लेकिन यह प्रश्न था-
अगर लिफ्ट बंद थी, तो आज चल कैसे रही थी?
सच्चाई के बेस्ट
अनिरुद्ध ने तय किया कि वह खुद उस लिफ्ट में जाएंगे।
उस रात वह ठीक 11:40 बजे बिल्डिंग टॉवर पर थी। चारों तरफ का छात्र था। रघु काका उसे दूर से देख रहे थे, लेकिन कुछ नहीं बोले।
घड़ी में 11:45 बजाते ही—
लिफ्ट नंबर 13 की लिफ्ट जल निकली।
दरवाज़ा अपना खोलो।
अनिरुद्ध का दिल जोर-जोर से देखने लगा, लेकिन उसकी आंख खुल गई।
नीचे से भी नीचे
लिफ्ट धीरे-धीरे नीचे जाने लगी।
प्रतिमा पर कोई नंबर नहीं दिख रहा था।
अचानक लिफ़्ट रुक गया।
दरवाज़ा खुला, लेकिन सामने कोई मंजिल नहीं थी। बस अँधेरा।
वही अँधेरे से आवाज़ आई—
“तुमने हमें याद किया?”
अनिरुद्ध के सामने पांचवीं धुंधली चोटी उभरी। उनके चेहरे थके हुए थे, आँखों में दर्द था।
“हम सबसे पीछे हैं,” उन्होंने एक बोला,
“जिस दिन हमें मारा गया, उस दिन किसी ने सच नहीं बताया।”
असली रहस्य
अनिरुद्ध को सच्चाई समझ में आने लगी।
हादसा नहीं था.
लिफ़्ट का केबल अनपेक्षित था।
निर्मित कंपनी ने पुराने सामान के लिए पैसे खर्च किए, इस्तेमाल किए गए सामान और डिजाइन में बदलाव की रिपोर्ट दी।
मजदूरों की आत्माएं अब भी न्याय का इंतजार कर रही हैं।
एक सौदा
“अगर तुम हमारी कहानी दुनिया को बताओ दो,”
आवाज़ फिर आई,
“तो हम इस लिफ़्ट को हमेशा के लिए बंद कर देंगे।”
अनिरुद्ध ने बिना सोचे हां कह दी।
अचानक लिफ्ट ऊपर जाने लगी।
दरवाज़ा खुला—वह फिर वही मंजिल पर था।
घड़ी में समय था—
11:46
अंत नहीं, आरंभ
अगले दिन अनिरुद्ध की रिपोर्ट चपी—
सम्पूर्ण प्रमाणों के साथ।
कंपनी पर केस चला।
प्रतिभा को सज़ा मिली।
उस दिन के बाद—
लिफ्ट नंबर 13 कभी नहीं चली।
लेकिन रघु काका कहते हैं-
अगर कोई रात 11:45 पर ध्यान से सुने,
तो अब भी लिफ्ट फ्लॉप से एक आवाज़ आती है—
“अब हमें शांति है।”
स्कूल की लड़कियां
| पात्र का नाम | कहानी में भूमिका | कहानी में काम |
|---|---|---|
| अनिरुद्ध वर्मा | मुख्य पात्र | रहस्य की जांच करते हैं, सच्चाई सामने लाते हैं |
| रघु काका | वामपंथी | लिफ्ट के रहस्य का पहला संकेत देते हैं |
| पांचों मजदूर | आत्माएं | पुराने मृतकों के असली टुकड़े हैं |
| सूर्यकांत | टावर स्थान | कहानी का केंद्र, जहां छिपा है रहस्य |
| निर्माण कंपनी | विरोधी पक्ष | सच्चाई छुपाने वाली संस्था |