काले नक़ब वाला आदमी

काले नक़ब वाला आदमी

आदमी

शहर का नाम देवगढ़ था। यह शहर बाहर से बिल्कुल शांत और साधारण दिखता था, लेकिन इसके अंदर कई अनकहे राज़ थे। यहां की गलियां रात में होती हैं अजीब सी मखमली ओढ़ क्रीड़ा वाली जगह। लोग समय से पहले अपने दरवाजे बंद कर लेते थे, क्योंकि उन्हें डर था – काले नकाब वाले आदमी से।

पिछले तीन महीनों से देवगढ़ में एक ही चर्चा थी। हर हफ्ते किसी अमीर या व्यक्ति के घर में चोरी होती थी, लेकिन अजीब बात यह थी कि चोरी के बाद कोई नुकसान नहीं हुआ था। न जाते पैसे थे, न मंजिल। असल में एक चीज़ थी – एक डायरी का पन्ना, जिस पर लाल शय्या से लिखा हुआ होता है:

“सच कभी छिपता नहीं।”

लोगों ने उस अजनबी को नाम दिया- काले नकाब वाला आदमी।

प्रथम डा

पत्रकार आरव मिश्रा की इस कहानी में बहुत सारी यादें थीं। अरव एक ईमानदार और सच्चाई के पीछे वाला पत्रकार था। उसे लगा कि यह कोई आम चोर नहीं, बल्कि कोई संदेश देने वाला इंसान है।

एक रात आरव अपने ऑफिस में देर तक रुके थे। तभी उसे एक अनायास नंबर से कॉल आया।

“अगर सच जानना हो, तो आज रात 12 बजे पुराने रेलवे स्टेशन पर आओ।”

फ़ोन कट गया.

आरव के मन में डर था, लेकिन उनमें सबसे ज्यादा जिज्ञासा थी। वह समय-समय पर इन्वेंटरी होटल में रुके। चारों तरफ था अँधेरा, बस ऊँची हवा और दरवाज़ों की आवाज़।

अचानक सामने से एक वोन मैन निकला। चेहरे पर काला नकाब, आँखों में अजीब सी चमक।

“तुम ही हो काले नकाब वाला आदमी?” अरव ने काम्पती आवाज़ में पूछा।

उस आदमी ने कहा, “नाम से नहीं, काम से पहचानो।”

सच्चाई की शुरुआत

उस आदमी ने आरवी को एक फाइल दी। इसमें कई नाम शामिल थे – बड़े व्यापारी, नेता और अधिकारी। सभी के आगे लिखा था – पुराना अपराध।

नकाब वाले ने कहा, ”ये सब लोग कभी गरीबों का हक लूटते हैं।”

“और तुम चोरी क्यों करते हो?” आरव ने पूछा।

वह आदमी हँसा।

“मैं चोरी नहीं करता, मुझे याद है।”

उसने बताया कि हर उस घर में वह जाता है जहां किसी ने अपने अतीत में किसी की जिंदगी बर्बाद की हो। वह उन्हें डराता नहीं, बल्कि उनका अंतरात्मा जगाता है।

इंस्पेक्टर का आगमन

देवगढ़ की पुलिस इस मामले से परेशान थी। मूर्तिकार विक्रम सिंह को केस दिया गया। वह सख्त लेकिन ईमानदार अधिकारी था।

एक रात पुरातात्विक विक्रम को भी अपने घर में डायरी का पन्ना मिला।

वह चौंक गया।

“मैंने तो कोई गुनाह नहीं किया…” उसने खुद ही बोला।

लेकिन जब उसने पन्ना पलटा, तो उसमें उसके पिता का नाम भी लिखा था।

उनके पिता एक समय बेकार अफ़सोर थे।

विक्रम समझ गया – यह मामला व्यक्तिगत है।

काले नकाब के पीछे का चेहरा

आरव और विक्रम सामूहिक सच्चाई तक पहुंचना चाहते थे। कई दिनों की खोज के बाद उनका एक नाम मिला – अमन वर्मा।

अमन एक साधारण शिक्षक था, जो अब लापता था। उनकी बहन मीरा वर्मा से मिलकर सच्चाई सामने आई।

मीरा ने आख्यायिका बताई,

“मेरे भाई ने एक घोटालेबाज को लूटने की कोशिश की थी। लेकिन उन लोगों ने उसे क्राफ्ट केसों में फंसा लिया। जेल में उसकी मौत हो गई।”

काले नकाब वाला आदमी – अमन का दोस्त कबीर था।

कबीर ने वादा किया था कि वह अमन की मौत का फायदा नहीं उठाएंगे।

आख़िरी रात

शहर में एक बड़ा कार्यक्रम था, जहां जो लोग आने वाले थे उनका नाम फाइल में था।

काले नकाब वाला आदमी वहाँ पहुँच गया।

लेकिन इस बार के लिए नहीं।

विक्रम और आरव ने उसे पकड़ लिया।

विक्रम ने कहा, “अब सब खत्म।”

कबीर ने नकाब उतार दिया।

“नहीं, अब सब शुरू होगा।”

आरव ने सारी सच्चाई मीडिया में दिखाई।

लोगों के सामने सारा राज खोला गया।

अंत, लेकिन कहानी ख़त्म नहीं

कबीर को सजा हुई, लेकिन लोगों की नजर में वह अपराधी नहीं, बल्कि सच का आईना बन गया।

देवगढ़ अब पहले जैसा नहीं था।

लोग डर से नहीं, सच्चाई से जीने लगे।

और कभी-कभी, जब रात बहुत शांत होती है, लोग कहते हैं –

अगर कहीं दूर से काले कपड़ों में कोई दिख जाए…तो समझ लेना, कोई सच फिर जाग रहा है।

 

कहानी के बारे में कहानियां

पात्र का नामभूमिकाकहानी में कार्य
आरवी मिश्रापत्रकाररियलिटी की खोज करते हैं और कहानी को जनता तक पहुंचाते हैं
काले नकाब वालाआदमी (कबीर)रहस्यमयी पात्र को अतीत की याद है
इंस्पेक्टर विक्रम सिंहपुलिस अधिकारीकेस की जांच करते हैं और अंत में सच्चाई स्वीकार करते हैं
अमन वर्माव्याख्याताशिक्षक के साथ अन्याय हुआ, कहानी की जड़
मीरा वर्माअमन कीअतीत की सच्चाई बताती है
अपवित्र व्यक्तिविरोधी पात्रअमान के साथ अन्याय

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