दरवाज़ा जो कभी खुलता नहीं – रहस्य कहानी

कस्बे के पुराने हिस्सों में एक हवेली थी। लोग उसे “चुप हवेली” कहते थे। उस हवेली का नाम सुनते ही लोग धीमी आवाज़ कर लेते थे, जैसे कोई सुन न ले। हवेली में सबसे ज़्यादा डरावनी चीज़ कोई भूत नहीं, बल्कि एक दरवाज़ा था—
वह दरवाज़ा जो कभी खुलता नहीं।
हवेली को लगभग सौ साल हो गए थे। समय के साथ दीवारों पर नाटकीय रूप से चित्रित जगह थी, एस्ट्रिक की लकड़ी का सामान था, लेकिन वह दरवाजा अब भी स्टूडियो था। भारी लोहा का बना हुआ, बिना हैंडल का। न उस पर ताला दिखता था, न कुंडी। फिर भी वह कभी नहीं खुला.
लोगों का कहना था कि जिसने भी दरवाजे पर चढ़ने की कोशिश की थी, उसके जीवन में कुछ आश्चर्यजनक घटनाएँ घटीं।
अफ़सोस और डर
बुज़ुर्ग के बुज़ुर्ग का कहना है कि उस कमरे में एक भयानक सच बंद है। कुछ लोगों का मानना था कि वहां कोई छिपा हुआ खाना है, तो कुछ का कहना था कि वहां किसी की ट्रैक्टर कहानी दबी है।
बच्चों को उस हवेली के पास जाने से मना किया गया था। रात में किसी के पास कोई नहीं था। हवेली जैसी समय के साथ नहीं, बल्कि डर के साथ खड़ी थी।
आरव की जिज्ञासा
आरव एक युवा लेखक थे। वह बस्ती में नई-नई आया था। उसे रहस्यमयी कहानियाँ वेट का शौक था। जब उन्होंने “दरवाज़ा जो कभी नहीं खुलता” के बारे में सुना, तो उनके दिमाग में यह बात आई।
अरव डरता नहीं था, लेकिन वह हथियारबंद भी नहीं था। उन्होंने सबसे पहले हवेली के इतिहास के बारे में जानना शुरू किया।
पुरानी डायरी का राज
नागालैंड की लाइब्रेरी में आरव को एक पुरानी डायरी मिली। वह हवेली के पहले मालिक ठाकुर ठाकुर सिंह की थी। डायरी के पन्ने पीले पड़ गए थे।
एक पन्ने पर लिखा था:
“मैंने अपना सबसे बड़ा पाप उस कमरे में बंद कर दिया है।”
वह दरवाज़ा एक बार फिर खुलागा, जब कोई सच को स्वीकार करेगा।”
आरव की नज़र तेज़ हो गई।
पाप? सच? स्वीकार?
अब रहस्य और गहरा हो गया।
मीरा की मदद
आरव की मुलाकात मीरा से हुई। मीरा मिर्जा की स्कूल टीचर थी और इतिहास में गहरी रुचि की कहानी थी। उन्होंने हवेली से जुड़ी कई बातें बताईं।
मीरा ने बताया कि ठाकुर सम्राट सिंह का एक पुत्र था-विक्रम। वह अचानक गायब हो गया था। किसी ने उसके निधन का कोई आकलन नहीं किया, कोई सबूत नहीं मिला।
बस एक बात अजीब थी—
विक्रम के गायब होने के बाद ही उसका दरवाजा बंद कर दिया गया था।
हवेली में प्रवेश
एक शाम आरव और मीरा ने हवेली में जाने का फैसला किया। हवेली के अंदर नौकर था। दीवारों से अजीब सी ठंडक निकल रही थी।
वे धीरे-धीरे उस दरवाज़े तक पहुँचे।
दरवाज़ा आदर्श ही था—बिना हैंडल, बिना धोए।
आरव ने उसे धक्का दिया।
कुछ नहीं हुआ.
मीरा ने मूल्यांकन किया। वहाँ पुराने शब्द कहे गए थे:
“सच से भागोगे, तो दरवाज़ा बंद रहेगा।”
सच की परतें
आरव को डायरी की बात याद आई—
“स्वकार करना”
उसी समय उन्हें एक बूढ़ा आदमी दिखा। वह हवेली का पुराना उपकरण था—रामदीन।
रामदीन की आँखों में डर और पछतावा था। उसने धीरे-धीरे-धीरे-धीरे सच बताया।
ट्रॅन सच
ठाकुर राक्षस सिंह ने अपने बेटे विक्रम को एक अपराध करते हुए देखा था। विक्रम ने गलती से एक आदमी की जान ले ली थी।
इज़्ज़त के लिए ठाकुर ने उसे उसी कमरे में बंद कर दिया।
विक्रम की मदद के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन ठाकुर ने दरवाजा कभी नहीं खोला।
कुछ दिन बाद आवाज़ें बंद हो गईं।
ठाकुर ने उस कमरे को हमेशा के लिए बंद कर दिया।
वह दरवाज़ा वफ़ादारी अपने अपराध की सज़ा था।
दरवाज़ा खुलता है
रामदीन ने काम्पती आवाज़ में कहा,
“सच मैंने कभी किसी को नहीं बताया।”
मीरा ने कहा,
“आज सच मान लिया गया है।”
जैसे ही रामदीन ने सच पूरी तरह से स्वीकार किया, ज़मीन हिलने लगी।
दरवाज़े से लाइट सी आवाज़ आई।
धीरे-धीरे…
बहुत धीरे-धीरे…
दरवाज़ा खुल गया।
अंदर कोई भूत नहीं था.
बस एक खाली कमरा और टूटी हुई जिंदगी की निशानियाँ थी।
अंत नहीं, आरंभ
दरवाज़ा के गोदाम के बाद हवेली का दरवाज़ा ख़त्म हो गया।
आरव ने यह कहानी लिखी, लेकिन उसे उपन्यास नहीं, बल्कि इंसानी भूल और पचावे की कहानी बनाई।
ज़मीन के लोग समझ गये—
दरवाज़े आयरन से नहीं,
सच से खुलते हैं।
कहानी के पात्र और उनकी भूमिका
| पात्र का नाम | भूमिका / काम |
|---|---|
| एक युवा | लेखक, जो रहस्यमई चमत्कार की कोशिश करता है |
| मीरा | स्कूल टीचर, इतिहास अन्वेषण वाली और आरव की सलाह |
| ठाकुर | हवेली सिंह हवेली का मालिक, जिसने छुपाया अपराध |
| विक्रम | विक्रम का बेटा, जो सच्चाई का शिकार बना |
| रामदीन | पुराने जमाने के कलाकार थे, जो सच जानते थे |
| दरवाज़ा | छुपे हुए अपराध और छतवे का प्रतीक |