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पुरानी डायरी का गुप्त पन्ना

पुरानी डायरी का गुप्त पन्ना

पुरानी डायरी

पुराने शहर की एक सांकरी स्ट्रीट में एक रेस्टोरेंट-सा मकान स्थित था। दीवारों पर प्लास्टर हुआ प्लास्टर, लकड़ी के चरमराते दरवाजे और मिट्टी पर कूड़ा-सब कुछ देखने के समय की कहानी थी। इसी मकान में रहना आई थी अनन्या, जो एक शांत स्वभाव की थी लेकिन जिज्ञासु लड़की थी। वह अपने दादाजी के पुराने मकान मालिक से पहले अपनी सफाई और कागज़ात में असुरक्षित थी।

दादाजी की मृत्यु को एक वर्ष पूरा हो गया। वे बहुत कम थे, लेकिन उनकी आँखों में हमेशा कोई अधूरी बात तैरती रहती थी। अनन्या को लगता है कि दादाजी के जीवन में कोई ऐसा रहस्य था, जिसके बारे में उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया।

एक दोपहर, जब धूप की खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थी, अनन्या वुड की एक पुरानी अलमारी साफ कर रही थी। लाइब्रेरी के सबसे नीचे एक सुधार-सालॉक था। जैसे ही उसने उसे आउट किया, अंदर से एक पुरानी, ​​​​भूरे रंग की डायरी निकल आई। डायरी के पन्ने पीले पड़ गए थे और उस समय के लेखन के साथ धुंधली हो गई थी।

डायरी के पहले कुछ उपन्यासों में रोज़मरा की बातें थीं—मौसम, गाँव की ख़बरें, छोटे-छोटे अनुभव। लेकिन बीच में पहुँचते ही अनन्या को कुछ अजीब लगा। कई पन्ने किस्मत में थे, और एक पन्ने पर लाल यादे से लिखा था—

“अगर यह पन्ना किसी के हाथ लगे, तो सच सामने आ जाएगा।”

अनन्या का दिल तेजी से देखने लगा। उसने समझा कि यही वह गुप्त पन्ना है, जिसमें दादाजी ने सबसे छिपाकर रखा था।

डायरी के उस पन्ने में एक घटना का ज़िक्र था, जो करीब चालीस साल पुराना था। उस समय दादाजी इसी शहर में एक सरकारी क्लर्क थे। पन्ने में लिखा था कि शहर के एक बड़े मंदिर की अचानक मौत हो गई, जिससे सबने दुर्घटना मानी गई। लेकिन दादाजी की मौत हमेशा के लिए जारी रही।

डायरी में आगे लिखा था कि दादाजी के पास कुछ ऐसे उपन्यास आए थे, जिसमें रेजीलेंट ने पता लगाया था कि जमींदारी की मृत्यु एक सुनियोजित साजिश थी। इस साज़िश में शहर के कुछ प्रतिष्ठित लोग शामिल थे। अगर यह सच है तो कई ताक़तवर लोगों की ज़िंदगी बदल जाती है।

लेकिन डायरी अधूरी अधूरी थी।

अनोखी उलझन में थी. क्या यह बस एक पुरानी कहानी थी या सच में कोई बड़ा रहस्य छिपा था? उसने तय किया कि वह इस बात की तह तक जाएगी।

अगले दिन उनकी मुलाकात दादाजी के पुराने मित्र शिवनारायण वर्मा से हुई। वर्मा जी अब बहुत बोतलें हो गए थे, लेकिन उनकी याददाश्त अब भी तेज़ थी। जैसे ही अनन्या ने डायरी का ज़िक्र किया, उनके चेहरे का रंग बदल गया।

उन्होंने मध्यम आवाज़ में कहा,
“तुम्हारे दादाजी बहुत ईमानदार आदमी थे। लेकिन उनकी ईमानदारी ही उनकी सबसे बड़ी मुसीबत बन गई थी।”

वर्मा जी ने बताया कि उस समय दादाजी ने सच सामने लाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें धमकियाँ मिल गईं। परिवार की सुरक्षा के लिए उन्होंने पीछे हटना ही ठीक समझा। उन्होंने छुपया और बस उस डायरी में सच्ची बातें लिखीं होने का सबूत दिया।

अनन्या को अब समझ आया कि दादाजी हमेशा चुप क्यों रहते थे।

वर्मा जी ने उन्हें एक पुराना पता दिया – शहर के बाहर एक सनसन पोर्टफोलियो का। उन्होंने कहा कि यथार्थ कहीं और नहीं है।

शाम ढलते ही अनोखा उस ज्वालामुखी तक पहुंच गया। दिल में डर था, लेकिन सच जानने की चाह हर जगह बहुत है। कलाकारों के अंदर अँधेरा और त्रासदी थी। नाव में जले लगे थे और ज़मीन पर मोटी धूल जमी थी।

एक पुराने लोहे के कागज में कुछ कागज़ मिले-ज़मीन की कहानियाँ, गवाहों के बयान और एक अधूरी रिपोर्ट। यथार्थ स्पष्ट थे। मस्जिद की मौत दुर्घटना नहीं, बल्कि हत्या थी।

अचानक पीछे से आवाज़ आई,
“तुम्हें यहाँ आना नहीं चाहिए।”

अनन्या घबरा गई। पीछे मुड़कर देखा तो शहर का एक अनोखा प्रतीक था—वही, जिसका नाम डायरी में ज्वालामुखी में लिखा था। वह इस बात का प्रमाण देता है कि वह हमेशा के लिए खाली रहना चाहता था।

लेकिन अनोखा दर्शन नहीं था. उसने पहले ही पुलिस और एक पत्रकार मित्र को जानकारी दे दी थी। कुछ देर में ही पुलिस वहां पहुंच गई।

आख़िरकार सच सामने आ गया।

कुछ महीने बाद, शहर में फिर से शांति थी। प्रतिभा को साज़ा मिल गया। दादाजी का नाम सम्मान के साथ लिया गया।

अनोखा उस पुराने मकान में, डायरी को अपने हाथों में लिए मुस्कुराती रही थी। उसे लगा कि कुछ रहस्य भले ही समय के साथ डूबे हों, लेकिन सच का एक गुप्त पन्ना हमेशा के लिए किसी को भी रास्ता नहीं दिखाता है।

 

कहानी के पात्र और उनका योगदान

पात्र का नामभूमिका/कार्य
अनोखामुख्य पात्र, दादाजी की पोती, रहस्य की खोज करने वाली
दादाजीप्रतिष्ठित सरकारी क्लर्क, रहस्य के गवाह
शिवनारायण वर्मादादाजी के मित्र, अतीत का सच बताने वाले
ज़ॉम्ज़दार की रहस्यमयीमौत हुई
आदर्शवादीखलनायक, साज़िश में शामिल
पुलिस अधिकारीन्याय खरीद वाला
पत्रकार मित्रसच को जनता तक व्यक्ति वाला
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