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रेलवे स्टेशन की आखिरी सिटी – एक रहस्यमय कहानी

रेलवे स्टेशन की आखिरी सिटी – एक रहस्यमय कहानी

रेलवे स्टेशन

शहर से दूर, जंगल और साख के बीच बसा था शिवपुर रेलवे स्टेशन। यह स्टेशन अब असेंबल समय सुनसान रहता था। कभी यहां से दिन में दो बार रुकती थी ट्रेन, लेकिन अब बस एक पैसेंजर ट्रेन में दिन में दो बार रुकती थी। शाम होते ही स्टेशन पर अजीब सी खामोशी छा गई थी।

इस स्टेशन की सबसे रहस्यमयी बात थी – आखिरी शहर।

स्थानीय लोग कहते हैं कि हर रात ठीक 12 बजे, जब कोई ट्रेन नहीं होती, तब भी स्टेशन से एक तेज़-तर्रार बिल्ली की आवाज़ आती है। न कोई इंजन, न कोई ड्राइवर – फिर भी इलेक्ट्रिक इकोनॉमी। उस समय मारे गए कई लोग स्टेशन के पास भी नहीं गए थे।

एक पत्रकार की शुरूआत

आरव एक युवा पत्रकार थे। उसे रहस्यमयी तस्वीरें पर काम करना पसंद था। जब उसने शिवपुर स्टेशन के आखिरी शहर के बारे में सुना, तो उसने तय कर लिया कि वह इस रहस्य को खुद समझेगा।

एक अनमोल शाम, अरव अपना बाग लेकर शिवपुर स्टेशन घाट। स्टेशन पर कुल मिलाकर एक बूढ़ी कुली थी, जो स्केटिंग-धीमे चाय पी रही थी।

“बाबा, यहाँ रात में सिटी की आवाज़ आती है, सच है क्या?”

आरव ने पूछा।

कुली ने चौंककर अपनी ओर देखा।

“बेटा, जो सोचता है, वो ये सवाल नहीं पूछता,”

उसने कहा।

स्टेशन मास्टर की कहानी

रेलवे स्टेशन मास्टर वर्मा जी से मुलाकात। वर्मा जी पिछले तीस पूर्वजों से इस स्टेशन पर थे।

“ये कोई भूत की कहानी नहीं है,”

वर्मा जी ने गंभीर आवाज़ में कहा।

“लेकिन यह स्टेशन एक पुराना गुल्हा की विरासत देता है।”

करीब बीस साल पहले, इसी स्टेशन से एक मालगाड़ी ग्रामीण थी। उस रात घना कोहरा था। एक सिग्नल की गलती से मालगाड़ी और यात्री यात्री यात्रा- प्रस्थान आ गया। टक्कर थी भयानक। कई लोग मारे गए।

सबसे दुखद बात यह है कि उस रात सैनिक गार्ड मोहन ने आखिरी बार ट्रेन में रुकने के लिए ज़ोर से सिटी बजाई थी। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। दुर्घटना के बाद मोहन लापता हो गया।

“लोग कहते हैं,”

वर्मा जी ने सनातन से कहा,

“की वही सीटी आज भी गूंजती है।”

रहस्य की रात

आरव ने तय किया कि वह रात 12 बजे स्टेशन पर ही रहेगा।

स्टेशन की लाइटें धुंधली थीं। हवा में अजीब सी ठंडक थी। दूर उल्लू की आवाज़ का मकसद दे रही थी।

घड़ी की सुइयाँ 11:59 पर ग्यान रुक सी गई, जैसे समय भी सांस रोककर खड़ी हो गई।

और तब—

एक तेज़ गति वाले स्टेशन के ग्लासगोज़ पर प्रकाश डाला गया।

आरव का दिल ज़ोर से देखने लगा। लेकिन उसने आवाज़ की बजाय आवाज़ की दिशा में जाना चुना।

एक अधूरा सच

सिटी ओल्ड सिग्नल रूम के पास से आ रही थी, जो प्राचीन काल से बंद था। दरवाज़ा जंग लग गया था, लेकिन थोड़ा धक्का देकर खोला गया।

अंदर एक बूढ़ा आदमी बैठा था। सफ़ेद बाल, काँपते हाथ और आँखें गहरी उदासी में।

“आप…आप मोहन हैं?”

आरव ने काँपती आवाज़ में पूछा।

बूस्ट मैन की आंखों से आंखें झलकी।

“हां… मैं वही हूं,”

उसने कहा.

मोहन ने बताया कि दुर्घटना के बाद उन्हें दोषी ठहराया गया था, जबकि गलती से ऊपर गलत जानकारी की थी। डर और शर्म के कारण वह भाग गया और इसी स्टेशन के पास छुपकर रह रहा था।

हर रात 12 बजे वह सिटी बजाता था –

“ताकी खुद को याद दिलाए कि वह आखिरी पल तक की कोशिश की थी।”

सच का उजाला

आरव ने साक्ष्यों के साथ साक्ष्यों की छाप में यह कहानी बताई। पुराने अभिलेख मिले और सच्चाई सामने आई। मोहन को दोषमुक्त कर दिया गया।

उस दिन के बाद, शिवपुर स्टेशन पर आखिरी सिटी फिर कभी नहीं देखी गई।

लेकिन आज भी, जब कोई ट्रेन वहां से चलती है, तो हवा में एक लाइट सी गूंज उठती है –

जैसे स्टेशन कह रहा हो,

“सच देर से सही, पर निश्चित रूप से आता है।”

कहानी के पात्र और उनकी भूमिका

पात्र का नामभूमिका / काम
एक युवा पत्रकार,रहस्य की खोज करता है
मोहनपूर्व रेलवे गार्ड, दुर्घटना से गुप्त सच छुपाए हुए
वर्मा जीस्टेशन मास्टर, अतीत की जानकारी देते हैं
बूढ़ी कुलीस्थानीय व्यक्ति, डर और अफ़गानों का प्रतीक
यात्री (प्रत्यक्ष)दुर्घटना के शिकार, कहानी की गहराई
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