मूर्ति की पहेली – रहस्य कहानी

पुराने शहर देवपुर की पहचान वहां की प्राचीन मूर्तियों से थी। मूर्तिपूजा में सबसे प्रसिद्ध कालेश्वर मंदिर था, जहां तेरहवीं पुरानी काले पत्थर की एक मूर्ति स्थापित की गई थी। कहा जाता था कि यह मूर्ति सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि शहर की आत्मा थी। जब भी शहर पर कोई संकट आया, मंदिर की घंटियाँ आप बज उठीं।
एक सुबह पूरे शहर में हंगामा मच गया।
कालेश्वर मंदिर की मुख्य मूर्ति टूटी हुई पाई गई।
मूर्ति का दाइयां हाथ तोड़ कर ज़मीन पर गिरा दिया गया था।
रहस्य की शुरुआत
मंदिर के पुजारी पंडित हरिनाथ काँपते हाथों से मूर्ति को देख रहे थे। उनकी आँखों में साक्षात् झलक आ रही थी।
“यह किसी बड़े अर्थ का संकेत नहीं है,” उन्होंने मध्यम आवाज़ में कहा, “यह किसी बड़े अर्थ का संकेत है।”
कुछ ही घंटों में खबर पूरे शहर में फैल गई। लोग मंदिर के बाहर जाम हो गए। कोई इसे चोरी की कोशिश बता रहा था, कोई इसे ईश्वर का क्रोध।
सिटी प्रशासन ने मामले की जांच के लिए युवा लेकिन तेज दिमाग वाले इंस्पेक्टर अद्वित शर्मा को बुलाया।
इंस्पेक्टर अद्वैत का आगमन
अद्वित जब मंदिर पहुंचे, तो उन्होंने सबसे पहले भीड़ को शांत किया। उन्होंने मूर्ति को बहुत ध्यान से देखा।
विश्वासघात का हिस्सा साफा-सुथरा था, जैसे किसी ने बहुत सोचा-समझकर युद्ध किया हो।
“अगर यह चोरी होती,” अद्वित ने सोचा,
“तो मूर्ति पूरी तरह से गायब है, बस हाथ नहीं।”
वे मन्दिर के चारों ओर दृष्टि दौड़ाते हैं। बिजनेस पर बिजनेस के निशान नहीं थे, बिजनेसमैन के निशान भी नहीं थे, और किसी बिजनेस पर बिजनेस के निशान भी नहीं थे।
ये रहस्य और गहरा घटित होता जा रहा था।
पुराना अध्ययन और रहस्य हुआ सच
अद्वित ने मंदिर के पुराने अभिलेख देखने का निर्णय लिया। मंदिर के पीछे एक छोटी सी लाइब्रेरी थी, जहां कूड़ेदान में कई पुरानी किताबें रखी हुई थीं।
वहीं उनकी मुलाकात मीरा वर्मा से हुई, जो एक इतिहास फोटोग्राफर थीं। वह देवपुर के इतिहास पर काम कर रही थी।
मीरा ने एक पुरानी माला पहनाई कहा,
“इस मूर्ति के बारे में एक किंवदंती है।”
किंवदंती के अनुसार, मूर्ति के हाथ के अंदर एक गुप्त संदेश छिपा था – एक ऐसा रहस्य जो शहर के सबसे बड़े लोगों को पता चल सकता है।
अद्वैत चौंक गए।
“क्या किसी को यह बात पता थी?” उन्होंने पूछा।
मीरा ने सिर हिलाया,
“बहुत कम लोगों को।”
संदेह के असंयम में लोग
आगे की जांच करें।
टेम्पल का एक कर्मचारी रघु, जो पिछले कुछ दिनों से परेशान चल रहा था, अचानक गायब हो गया।
शहर के एक अमीर व्यापारी विक्ट्री सेठ ने हाल ही में मंदिर के खजाने में हीरा दिखाई दिया था।
हर कोई शक के कमरे में था।
अद्वित ने रघु के घर की सैर ली। वहां से उन्हें एक लोहे का औज़ार मिला, जिस पर काले पत्थर के कण लगे थे।
लेकिन कहानी ख़त्म नहीं हुई।
टूटा हुआ हाथ और छिपा हुआ संदेश
मीरा की मदद से अद्वित ने मूर्ति के टूटे हाथ की जांच की। एक्स-रे रिपोर्ट में एक मॉडल वाली बात सामने आई है।
हाथ के अंदर एक मेटल की चिपचिप चिप हुई थी।
उस पर कुछ शब्द खुदे थे।
वे शब्द थे-
“सत्य पत्थर में नहीं, इतिहास में स्थापित है।”
इस संदेश का मतलब सामान आसान नहीं था।
असली अपराधी का खुलासा
अद्वित ने साक्ष्यों को जोड़ने की शुरुआत की।
रघु ने मूर्ति नहीं तोड़ी थी। वह सचमुच डर के मारे भाग गई थी क्योंकि उसने किसी और को मंदिर में देखा था।
असली सच्चाई तब सामने आई जब मीरा ने स्वीकार किया-
वह मूर्ति का हाथ का ढांचा था।
मीरा की आवाज़ काँप रही थी।
“मैं इस रहस्य को दुनिया के सामने लाना चाहता था। इस मूर्ति को एक झूठ के रूप में छिपाकर रखा गया था। शहर के संस्थापकों ने एक विचित्र व्यक्ति को एक आकर्षक व्यक्ति से मार डाला था, और यह संदेश उसी सच्चाई का सबूत था।”
मीरा अपराधी थी, लेकिन उसकी व्यवस्था ग़लत नहीं थी।
अंत में, जो प्रश्न छोड़ दिया गया
मीरा को क़ानूनी प्रक्रिया के तहत सज़ा दी गई, लेकिन उनकी खोज ने देवपुर का इतिहास बदल दिया।
मूर्ति की प्राप्ति हुई, लेकिन अब लोग उसे केवल ईश्वर नहीं, बल्कि सत्य के प्रतीक के रूप में देखने लगे।
इंस्पेक्टर अद्वैत ने मंदिर से खोजा खोया-
“कभी-कभी सबसे बड़ी पहेलियाँ पत्थरों में नहीं, इंसानों के अवशेषों में छुपी होती हैं।”
और कालेश्वर मंदिर की घंटियाँ उस शाम फिर से बज उठीं।
कहानी के पात्र और उनकी भूमिका
| पात्र का नाम | भूमिका/कार्य |
|---|---|
| इंस्पेक्टर | अद्वैत शर्मा मुख्य जांच अधिकारी, मिस्ट्री स्टोन वाला |
| मीरा वर्मा | इतिहास संगीतकार, सच्चाई संपर्क करने वाली |
| पंडित हरिनाथ | मंदिर के पुजारी, आस्था के प्रतीक |
| रघु | मंदिर कर्मचारी, सिद्धांत का शिकार |
| विजय | सेठ व्यापारी, संदेह के गोदाम में |
| कालेश्वर | मूर्ति कथा का केंद्रीय रहस्य और प्रतीक |